ब्रह्मचर्य का पालन कर, बन सकते हैं महान!

इनपूट-नई दुनिया
March 20 / 2017

एक बार की बात है, स्वामी विवेकानन्द अपनी यूरोप यात्रा के दौरान जर्मनी गये थे। वहां कील यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पॉल डयूसन स्वामी विवेकानन्द की अद्भुत याददाश्त देखकर दंग रह गये थे।

तब स्वामी जी ने रहस्योद्घाटन करते हुए कहा थाः 'ब्रह्मचर्य के पालन से मन की एकाग्रता हासिल की जा सकती है और मन की एकाग्रता सिद्ध हो जाये तो फिर अन्य शक्तियां भी अपने-आप विकसित होने लगती हैं।'

उन्होंने आगे कहा, 'ब्रह्मचर्य का ऊंचे में ऊंचा अर्थ यही हैः ब्रह्म में विचरण करना। जो ब्रह्म में विचरण करे, जिसमें जीवभाव न बचे वही ब्रह्मचारी है। 'जो मैं हूं वही ब्रह्म है और जो ब्रह्म है वही मैं हूं....' ऐसा अनुभव जिसे हो जाये वही ब्रह्मचर्य की आखिरी ऊंचाई पर पहुंचा हुआ परमात्मस्वरूप है।'

संयम की आवश्यकता सभी को है। चाहे बड़ा वैज्ञानिक हो या दार्शनिक, विद्वान हो या बड़ा उपदेशक, सभी को संयम की जरूरत है। स्वस्थ रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है, सुखी रहना हो तब भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है और सम्मानित रहना हो तो भी ब्रह्मचर्य की जरूरत है।

कोई चारों वेद पढ़कर कंठस्थ कर ले एवं उसका अर्थ भी समझ लें, उसके पुण्य को तराजू के एक पलड़े पर रखें और दूसरे पलड़े पर कोई अंगूठा छाप है लेकिन आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य से बचा है उसका पुण्य रखे तो ब्रह्मचारी का पलड़ा भारी होगा।

ब्रह्मचर्य ऊंची समझ लाता है। अगर ब्रह्मचर्य नहीं है तो गुरुदेव दिन-रात ब्रह्मज्ञान का उपदेश देते हैं फिर भी नहीं रहता है। जो ब्रह्मचारी रहता है, वह आनंदित रहता है, निर्भीक रहता है, सत्यप्रिय होता है।

उसके संकल्प में बल होता है, उसका उद्देश्य ऊंचा होता है और उसमें दुनिया को हिलाने की सामर्थ्य होती है।

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